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National Nutrition Week 2011-12




National Nutrition Week is being celebrated from 1st September 2011 to 7th September 2011. The theme for National Nutrtion Week 2011-12 is 

पोषण  की सीढ़ी चढ़कर बढ़ेगी अगली पीढी - यही है सोच हमारी 
Adequate nutrition iduring infancy and early childhood is essential to ensure the health, growth and development of children to their full potential. Nearly one third  of under five deaths in India are due to under-nutrition
Optimal infant and young child feeding practices are the cornerstone of child care and development. Feeding is critical aspect of caring for infants and young children. 
Article on  nutrition at this website is listed below :


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पर्याप्त स्तनपान के लक्षण

नवजात शिशु का आहार समय के अनुसार बढ़ता है| मां और बच्चे एक दूसरे को समझते हैं, और समय के साथ, और अच्छे तरह से स्तनपान होता है| लेकिन कभी-कभार सब कुछ ठीक तरह से नहीं हो पाता है| तब यह जानना जरूरी होता है कि बच्चे को पर्याप्त दूध मिल रहा है कि नहीं | साथ ही यह मां के लिए ख़ुद एक अलग समस्या हो सकता है| इस पन्ने पर हम इस विषय पर बात करेंगे|
1.  कितने बार दूध पिलाना चाहिए?

  • पहले दो महीनों में आपका बच्चा 8 से 12 बार प्रतीदिन स्तनपान कर सकता है| यह 2 से 3 घंटे के अंतराल पर हो सकता है| कभी-कभार 4 घंटे तक भी बच्चा सो सकता है| लेकिन उससे अधिक होने पर, बच्चे को नींद से जगा कर दूध पिलाने का कोशिश करना चाहिए| नवजात शिशु, रात में भी 1 से 2 बार तक दूध पी सकता है |
  • अगर आपका बच्चा 24 घंटे में 8 बार से कम दूध पी रहा है तो उसका वजन कम हो सकता है|
  • अगर आपका बच्चा 6 घंटे से ज्यादा लगातार सो रहा है, तो उसका वजन कम हो सकता है|
  • दूध पीते समय दूध को निगलना
  • दूध पीने के बाद संतुष्ट प्रतीत होना
  • बच्चा तय करता है कि उसे कितना देर तक दूध पीना है। यह 10 से 20 मिनट तक हो सकता है। यह एक तरफ या दोनों तरफ हो सकता है।

2.  बच्चे का वजन
सभी नवजात शिशु जन्म के तुरंत बाद वजन खोते हैं, और लगभग २ हफ्ता तक के उम्र में, उनका वजन जन्म के वजन के बराबर या उससे अधिक होना चाहिए| जो बच्चा समय से पहले होते हैं, या प्रिमेच्योर (premature) होते हैं, उनको वजन बराबर करने में ३ हफ्ता लग सकता है| अगर किसी बच्चा का वजन २ हफ्ते बाद, जन्म के वजन से कम है, तो डाक्टर से जरूर दिखलाना चाहिए कि क्या आपके बच्चे को पार्याप्त पोषण मिल रहा है कि नहीं | २ हफ्ते पर नवजात शिशु का वजन जांच जरूर करायें |
3.  पैशाब और पैखाना

  • स्वस्थ बच्चा प्रतीदिन 8 से अधिक बार पैशाब करता है|
  • पहले महीना में स्वस्थ नवजात शिशु दिन में कम से कम एक बार पैखाना करता है| दूसरे महीने में यह कम हो सकता है| हर बच्चे में यह अलग अलग हो सकता है कि किसी बच्चे को दिन में 5 बार भी पैखाना हो रहा है, तो किसी दूसरे को 7 दिन में 1 बार पैखाना हो रहा है| महत्वपूर्ण बात यह होता है कि क्या बच्चा स्वस्थ दिख रहा है कि नहीं, अर्थात ठीक तरह से दूध पी रहा है, पैशाब हो रहा है, कोई उल्टी नहीं हो रहा है, पेट नहीं फूला हुआ है और अन्य कोई समस्या नहीं है| यह भी देखना जरूरी है कि अधिक बार पैखाना कहीं दस्त या डाईर्हेया (diarrhea) तो नहीं है और कम पैखाना कहीं कब्जीयत या कोंसटीपेशन (constipation) तो नहीं है|

4.  नवजात शिशु बहुत रोता है
साथ ही कभी कभार स्वस्थ बच्चे में भी हर रोज अत्याधिक रोना हो सकता है, जिसे कोलिक (colic) कहते हैं|
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स्तनपान के फ़ायदे

1.  स्तनपान के क्या फ़ायदे हैं?
स्तनपान के अनेक फ़ायदे हैं| तमाम रिसर्च यही कहते हैं कि नवजात शिशु के लिए मां के दूध से बेहतर और कोई भी दूध नहीं होता है| इससे दोनों मां और बच्चे को अनेक लाभ पहुंचता है| इसके टक्कर में न तो कोई जानवर (गाय, भैंस इत्यादि) का दूध है और न ही कोई कृत्रिम (artificial) दूध है|
2.  क्या कृत्रिम दूध (artificial milk), मां के दूध (maternal milk) के जैसा नहीं होता है?
कोई भी कृत्रिम दूध, मां के दूध के गुणवत्ता (properties), का अनुकरण (copy) करने का कोशिश कर सकता है, लेकिन सही माने में यह अनुकरण हो ही नहीं सकता है| यह इस लिए कि मां के दूध में अनेक गुणधर्म हैं, जिनका अनुकरण करना नामुमकिन है | कृत्रिम दूध में मां के दूध के जैसा सामग्री "कार्बोहाइड्रेट (carbohydrate), प्रोटीन (Protein), फ़ेट (Fat) और विटामिन इत्यादि" डाल दिए जाते हैं, किंतु इनका मात्रा नियत (fixed) रहता है| दूसरे तरफ मां के दूध में इनका मात्रा बदलते रहता है| कभी मां का दूध गाढा रहता है तो कभी पतला, कभी दूध कम होता है तो कभी अधिक, जन्म के तुरंत बाद और जन्म के कुछ हफ्तों बाद या महीनों बाद बदला रहता है| इससे दूध में उपस्थित सामग्री का मात्रा बदलते रहता है, और यह प्रकृति का बनाया गया नियम है कि मां का दूध बच्चे के उम्र के साथ बदलते (adjust) होते रहता है|
उपर लिखे भौतिक गुणवत्ता (physical properties) के अलावे, मां के दूध में अनेक जैविक गुण (biological properties) होते हैं, जो कि कृत्रिम दूध में नहीं होते हैं| उदाहरण के लिए मां के दूध देने से मां-बच्चे के बीच लगाव (bonding), मां से बच्चे के रोग से बचने के लिए प्रतिरक्षा (इम्युनिटी या immunity) मिलना और अन्य| इसके बावजूद, जिन मां को अपना दूध नहीं हो पाता है, उनके लिए फ़िर यही जानवर या कृत्रिम दूध का सहारा होता है| इसके बारे में अन्य जगह जिक्र किया गया है|
3.  मां के दूध से बच्चे को क्या लाभ होता है?

  • खाना का प्राप्ति
  • बच्चे का पूर्ण विकास
  • प्रतिरक्षा या इम्युनिटी (immunity) में बढाव
  • बुद्धि में विकास
  • संक्रमित बीमारियों (infections) से बचाव, जैसे कि दस्त और चर्म रोग
  • एलर्जी (allergy) से बचाव
  • मोटापा से बचाव
  • मां-बच्चे के बीच लगाव ‌
4.  इससे मां को क्या लाभ होगा?

  • मां को बच्चे से लगाव
  • संतुष्टि
  • बोतल के दूध को बनाने और साफ करने के झंझट से बचना
  • फ्री - पैसा बचाना
  • सदा उपलब्ध - दिन में या रात में, घर में या बाहर में
  • अपने उपर भरोसा
  • माहवारी को रोकना, जो कि तुरंत फ़िर गर्भ होने को रोक सकता है
  • अपने बच्चे को संक्रमित बीमारियों से बचाना जो कि गंदे बोतल या उसके निप्पल से हो सकता है
  • स्वस्थ बच्चा
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स्तनपान के विभिन्न तरीके/Breeastfeeding Positions


1.  ब्रेस्टफीडिंग के विभिन्न तरीके

ब्रेस्ट्फीडिंग के विभिन्न तरीके होते हैं। आप इसमें से जो भी आपको आसान लगे, वह अपना सकते हैं। यहां उन तरीकों के बारे में बताया जा रहा है। जो भी तरीका अपनायें, यह जानना जरूरी है कि बच्चा सही तरह से दूध पी रहा है, अन्यथा नवजात शिशु का अच्छे तरह से पोष्ण नहीं होगा। साथ ही, गलत तरह से दूध पिलाने से, स्तन में अनेक तरह का परेशानी हो सकता है, जो आगे जाकर बच्चे को दूध पिलाने में दिक्कत कर सकता है। ये स्थिती हो सकता है, जैसे कि निप्पल में दर्द, कटना, खून बहना, अत्याधिक दूध भरा रहना इत्यादि। इन सभी के बारे में अन्य जगह बताया गया है।
2.  “लेचिंग” (latching) का क्या मतलब होता है?
“सही तरह से बच्चा को दूध पिलाने” को लेचिंग कहते हैं। सही तरह के लेचिंग के समय, बच्चे का मुंह स्तन पर इस तरह लगा होता है कि बच्चे का मुंह बड़ा खुला होता है, और उसका नीचे का मसूड़ा, ब्रेस्ट के निप्पल और एरियोला का घेरा होता है। इसके बारे में यहां बताया गया है।

3.  क्रेडल होल्ड (cradle hold) क्या होता है?

Cradle hold
Cradle Hold 
इस स्थिती में आप अपने बच्चे के सिर को, अपने कोहनी के अन्दर से, सहारा दे सकते हैं। दूसरे हाथ के सहायता से अपना स्तन बच्चे के मुंह से लगा सकते हैं। यह सबसे ज्यादा प्रचलित तरीका। शुरू के हफ्तों में यह तरीका अपनाने में मुश्किल हो सकता है, क्योंकि बच्चा का गर्दन कमजोर होता है, और इस स्थिती में कोई अन्य तरीका आप अपना सकते हैं। बाद में, जब बच्चा का गर्दन मजबूत हो जाता है, तो अपना सिर उठा कर आपके स्तन से लगा सकता है, और तब यह तरीका बहुत ही सुविधाजनक लग सकता है।

4.  क्रोस-ओवर होल्ड (Cross-over hold) क्या होता है?

इसमें आप अपने हाथ से बच्चे के सिर को सहारा देते हैं। आपकी उंगलियां उसके एक कान के पास होती हैं, और अंगूठा, दूसरे कान के पास होती हैं। बच्चा का सिर हथेली पर होता है। अपने दूसरे हाथ से आप अपने स्तन को बच्चे के नाक के स्तर पर रखते हैं, उसके मुंह के स्तर पर नहीं रखना चाहिये। जब बच्चा संकेत मिलने पर बड़ा मुंह खोलेगा, तब आप उसे अपने स्तन से लगा लें। अपने दूसरे हाथ के उंगलियों और अंगूठा को अपने स्तन के एरियोला के पीछे रखकर, अपना स्तन को बच्चे के मुंह के तरफ निर्धारित करें। इस तरह आप सही तरह से लेचिंग कर सकते हैं। अगर सही तरह से नहीं हो रहा है, तो ध्यान दें कि क्या बच्चा का मुंह पूरा तरह से खुला है कि नहीं, क्या उसका सिर को आपके हथेली से पूरे तरह से सहारा मिल रहा है कि नहीं, क्या उसका नाक का स्तर (level) आपके स्तन के बराबर है कि नहीं और अन्य बातें।

5.  फुटबाल होल्ड (football hold) क्या होता है?

Football hold
Football Hold
इसमें आप अपने बच्चे को बगल में रखते हैं। पहले आप आराम से कुर्सी पर बैठ जायें, या पल्थी ले के बैठ जायें। बगल में एक तकिया रख लें। बच्चे को उस पर लिटा दें। इसमें आप अपने हाथ से बच्चे के सिर को सहारा देते हैं, जैसे कि आप अपने बगल में एक फुटबाल को पकडे हुये हैं। आपकी उंगलियां उसके एक कान के पास होती हैं, और अंगूठा, दूसरे कान के पास होती हैं। बच्चा का सिर हथेली पर होता है। अपने दूसरे हाथ से आप अपने स्तन को बच्चे के नाक के स्तर पर रखते हैं, उसके मुंह के स्तर पर नहीं रखना चाहिये। जब बच्चा संकेत मिलने पर बड़ा मुंह खोलेगा, तब आप उसे अपने स्तन से लगा लें। अपने दूसरे हाथ के उंगलियों और अंगूठा को अपने स्तन के एरियोला के पीछे रखकर, अपना स्तन को बच्चे के मुंह के तरफ निर्धारित करें। इस तरह आप सही तरह से लेचिंग कर सकते हैं।

6.  फुटबाल होल्ड (football hold) कब करना चाहिये?

  • आपको प्रसव के दौरान सिज़ेरीयन सर्जरी हुआ है, और आप अपने पेट के टांके पर दवाब नहीं देना चाहते हैं।
  • आप अपने बच्चे को देखना चाहते हैं कि सही तरह से “लेचिंग” हुआ कि नहीं?
  • अगर नवजात शिशु का वजन सामन्य से कम है, या समय से पहले हुआ है और छोटा है।
  • अगर बच्चे को अन्य स्थिती में पीने में दिक्कत होता है या दूध पीते हुये सो जाता है।
  • आपका निप्पल अंदर के तरफ है, या “इंवरटेड निप्पल” है।
  • आप को प्रसव में दो शिशु हुये हैं, या टविंस (twins) हुये हैं।

7.  साईड-लाइंग होल्ड (Side lying hold) क्या होता है?

side lying position
Side lying position
इसमें आप बच्चे को सो कर दूध पिलाते हैं। बगल में करवट लेकर लेट जायें। एक हाथ से आप बच्चे को सहारा देते हैं, और दूसरे हाथ से आप अपने स्तन को बच्चे के मुंह तरफ निर्धारित करते हैं।

8.  साईड-लाइंग होल्ड (Side lying hold) कब करना चाहिये?

  • सिज़ेरीयन सर्जरी के बाद आपको किसी कारण से लेटे रहने के लिये कहा गया है।
  • आपको उठ कर बैठने में दिक्कत या दर्द होता है।
  • आपको ब्रेस्टफीडिंग कराने के लिये किसी से सहारा चाहिये है।
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